
11 अप्रैल 2020, शाम 4.30 बजे । बरसों पहले एक फिल्म देखी थी- मशाल। उस फिल्म के एक दृश्य में दिलीप कुमार अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाना चाहते हैं। वह जीवन और मृत्यु के संघर्ष में...

9 अप्रैल 2020, रात 8 बजे । महामारी ने लोगों की मति मारनी शुरू कर दी है। सामाजिक रिश्ते तो अपनी जगह हैं, तमाम जगहों पर पारिवारिक और मानवीय संबंध भी उथले साबित हो रहे हैं। यह दौर अगर लंबा...

8 अप्रैल 2020, प्रात: 8.30 बजे शक का जहर अगर समूचे समाज में फैल जाए, तो जान लीजिए कि आप उस स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां से वापसी आसान नहीं होती। वैसे भी आपसी विश्वास के तंतु कच्चे धागों से बिने...

7 अप्रैल 2020, दोपहर-2 बजे। सूरज के सातवें घोड़े की तरह सरपट दौड़ते वक्त ने अपनी कांख में ऐसा गहरा गड्ढा छुपा रखा होगा, जिसमें समूची धरती के वाशिंदे एकसाथ समा जाएंगे, क्या ऐसा किसी ने सोचा था? समय...
5 अप्रैल 2020. रात 9.30 बजे । ऐसा लगता है, जैसे समूचा देश रात के नौ बजने का इंतजार कर रहा था। महानगरों की बहुमंजिला रिहायशें हों या फिर गांवों की झोपड़ियां, एकसाथ लोग अपने-अपने दरवाजों,...
4 अप्रैल 2020, शाम 7 बजे कोरोना का दानवी पंजा अपनी पकड़ हर रोज मजबूत करता जा रहा है। ऐसे मे जरूरी है कि इंसान, इंसान के करीब आए पर ऐसा हो कहां रहा है? कल से आज तक खबरों के महासागर...
2 अप्रैल 2020, रात 9 बजे । कोरोना की कालिख गहरी होती जा रही है। ये सिर्फ महामारी भर नहीं रह गई है। इसने समाज, सरकार, सरोकार और इंसानी संवेदनाओं पर अपना घातक पंजा जमा दिया है। यह समय मानवता के...
31 मार्च 2020, रात 9 बजे । मैंने कल भी सवाल उठाया था, मानवता बड़ी या धार्मिक कर्मकांड? आज यह प्रश्न कनपटी पर पड़े किसी झन्नाटेदार तमाचे की भांति लोगों के दिमाग को सनसना रहा है। कल दिल्ली में...
30 मार्च 2020, रात 2.30 बजे। आजकल दिन बंजर और रातें बाँझ हो गयी हैं।सुबह उठता हूं। कुछ कसरत करता हूं। नीचे गेट पर जाकर अखबार चुनता हूं। चुनना इसलिए पड़ता है क्योंकि सोसायटी वालों ने बाहर से...
29 मार्च 2020, रात 8.30 बजे आघात लगते ही आती है मूर्छा। मूर्छा के बाद कुछ कर गुजरने की लालसा और अंत में असलियत का अहसास । असलियत की कठोरता मन में दहशत रोपती चली जाती है। समूची दुनिया इस समय...